Tuesday, September 27, 2016

A small creation, Dedicated to my Creator!


भोर होते ही बिस्तर छोड, तुम टिफिन बनाती हो।
घडी की सूई को लजाकर, स्कूल छोड आती हो।
पढ़कर नाम रोशन करना, यह मंजिल दिखलाती हों।
प्रश्न यह उठता हैं मन में, इतना विश्वास तुम कहाँ से लाती हो ।।

स्कूल की घण्टी बजते ही, गेट पर नजर आती हो।
एक किलोमीटर पैदल चल, आलस्य को लजाती हो।
प्यार भरी पुचकार से, दिन भर की थकान मिटाती हो।
प्रश्न यह उठता हैं मन में, इतनी ताकत तुम कहाँ से लाती हो।।

घर पर आते ही तुम होमवर्क कराती हो।
टीवी, किटी का मोह छोड, भविष्य का ख्वाब सजाती हो।
गलती होने पर डाँटती हो, पर बाद में आँसू बहाती हो।
प्रश्न यह उठता हैं मन में, इतनी हिम्मत तुम कहाँ से लाती हो।।

प्रताप, लक्ष्मीबाई की गाथा सुना तुम प्रेरणा जगाती हो।
मैंडल, ट्राफी पर खुश हो, आभुषणों का सा इठलाती हो।
कला भी पढ़ाती हो और गणित भी पढ़ाती हो।
प्रश्न यह उठता हैं मन मे, इतना हुनर तुम कहाँ से लाती हो।।

बीमार होने पर भी काम कर, तुम बीमारी को भगाती हो।
पाई पाई जोडकर तुम आशियाना सजाती हो।
पापा के कदम से कदम मिला, तुम घर को महकाती हो।
प्रश्न यह उठता है मन में, इतनी तपस्या तुम कैसे कर पाती हो।।

अबला होने के दुनिया के मत को झुठलाती हो।
शेरनी के शावक होने का सा एहसास कराती हो।
मुश्किल घड़ी मे पति की ढ़ाल बन जाती हो।
प्रश्न यह उठता है मन में, इतना हौसला तुम कहां से लाती हो।।

बेटियां सयानी हुई, कहकर ब्याह रचाती हो।
दिल के टुकड़े से अलग होने के गम को भीतर ही दफनाती हो।
नये माँ-बाप की सेवा करना, कहकर विस्मित कर जाती हो।
प्रश्न यह उठता है मन मे, इतना त्याग तुम कहॉ से लाती हो।।

माना यह दुनिया की रीत है, पर क्या कोई जन्मदात्री के बराबर हो पाता है।
रूह में अलग हो क्या जिस्म जिंदा रह पाता है।
दूर रहकर भी हरपल पास होने का एहसास कराती हो।
औरत हो या जगजननी, सर्वस्व देकर भी कैसे मुस्कुराती हो।।

No comments:

Post a Comment