हृदय की गहराई तक कैसे जा पाओगे,
मन के भावों को कैसे समझ पाओगे,
तुम पुरुष हो, अनम्य हो,
तना हो तो जड़ तक कैसे पहुँच पाओगे।
दुनिया की ऐनक से देखोगे तो नयनो को कैसे पढ़ पाओगे,
अहंकार की चादर ओढ़े, मन की परतें कैसे खोल पाओगे,
क्षितिज बनाने के लिए थोड़ा झुकना होगा,
आसमान हो तो धरा को कैसे जान पाओगे।
दीपक हो, पर बिन बाती के क्या रोशन कर पाओगे,
कलम के बिना तो कोरा कागज़ ही रह जाओगे,
तुम विस्तृत हो, समन्दर हो,
पर तरंगों के बिना तो अधूरे ही कहलाओगे।
तुम ईश हो पर भक्ति बिना अस्तित्वहीन हो जाओगे,
बल हो, भावनाएं समझने की कोशिश कर पाओगे?
तुम दर्पण हो,
क्या खुद का प्रतिबिम्ब देख पाओगे?
-मेघा शर्मा
मन के भावों को कैसे समझ पाओगे,
तुम पुरुष हो, अनम्य हो,
तना हो तो जड़ तक कैसे पहुँच पाओगे।
दुनिया की ऐनक से देखोगे तो नयनो को कैसे पढ़ पाओगे,
अहंकार की चादर ओढ़े, मन की परतें कैसे खोल पाओगे,
क्षितिज बनाने के लिए थोड़ा झुकना होगा,
आसमान हो तो धरा को कैसे जान पाओगे।
दीपक हो, पर बिन बाती के क्या रोशन कर पाओगे,
कलम के बिना तो कोरा कागज़ ही रह जाओगे,
तुम विस्तृत हो, समन्दर हो,
पर तरंगों के बिना तो अधूरे ही कहलाओगे।
तुम ईश हो पर भक्ति बिना अस्तित्वहीन हो जाओगे,
बल हो, भावनाएं समझने की कोशिश कर पाओगे?
तुम दर्पण हो,
क्या खुद का प्रतिबिम्ब देख पाओगे?
-मेघा शर्मा
