जूही की बेल अभिनन्दन करती है,
हरियाली दूब थकावट हर लेती है,
मटके का शीतल जल तुम्हारी तृष्णा हर लेगा,
आँगन का बयार अहंकार दूर कर देगा,
पत्थर की दीवारों को कुछ यूं जिलाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
तनाव को उतार कर खूँटी पर टांक दो,
निश्चिंतता के वस्त्रों को धारण कर लो,
चौक के नल से क्रोध को धो डालो,
प्रसन्नता के तौलिये से ग़मों को पौंछ डालो,
प्रेम और विश्वास का दीवान लगाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
नवरसों को डालकर भोजन पकाया है,
स्नेह का उसमें तड़का लगाया है,
उमंग का अतिरिक्त घी उंढेल कर,
मुस्कान के मीठे गुड़ में मिलाया है,
अपनेपन रुपी थाली में परोसाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
देखो, आँगन का झूला कुछ सन्देश देता है,
जीवन के उतार-चढाव का उपदेश देता है,
विकट परिस्थिति में तुम वृक्ष के तने सा जम जाना,
और उन्नति में तुम फलों की डाल सा झुक जाना,
कुछ इस तरह प्रांगण ने जीवन दर्शाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
चूल्हे पर आशारूपी जल को रख कर,
उसमे संतुष्टि का दूध औटाया है,
थोड़ी समर्पण की अदरक को कूट कर,
भावनाओं रुपी चाय को चढ़ाया है,
मिटटी के घर को जिजीविषा सा महकाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकाल लेना,
रिश्तों के इन पौधों में थोड़ा पानी डाल देना,
खुशियों रुपी कुछ पुष्प बटोर ले आना,
और घनिष्टता रुपी जूड़े में लगा देना,
धन न सही, तन और मन से सजाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
पंछियों के कलरव का रसपान कर लो,
बच्चों की निश्छलता का अभिमान कर लो,
धुप और छाँव से मिश्रित इस आँगन में,
चिंताओं को भूल कर कुछ विश्राम कर लो,
प्रेम और उत्साह के रंगों से पुतवाया है,
ख़्वाबों का मैंने आशियाना बनाया है।
-मेघा शर्मा
04/01/2021

अति सुंदर रचना, महोदया।
ReplyDeleteभावना